Bihar Board Class 10th Hindi VVI Subjective 2023

Bihar Board Class 10th Hindi VVI Subjective 2023| Hindi Subjective Question 2023 Bihar Board|100% Fix यही आएगा

15Bihar Board Class 10th Hindi VVI Subjective 2023| Hindi Subjective Question 2023 Bihar Board

 

  1. निम्नलिखित पंक्तियों का भाव-सौंदर्य स्पष्ट करें :

” धूप में बारिश में

गर्मी में सर्दी में

हमेशा चौकन्ना

अपनी खाकी वर्दी में

उत्तर- प्रस्तुत काव्य पंक्तियाँ हमारी पाठ्यपुस्तक के ‘एक वृक्ष की हत्या’ काव्य पाठ से ली गयी है। इन पंक्तियों का प्रसंग, एक बूढे वृक्ष को चौकीदार के रूप में चित्रित किए जाने से जुड़ा हुआ है। कवि कहता है कि कोई भी मौसम हो, धूप अथवा बारिश हो चाहे गर्मी या सर्दी का माह हो, बूढ़े वृक्ष को देखकर लगता है कि वह हमेशा सतर्कता के साथ, निडरता और तत्परतापूर्वक खाकी-रूपी वर्दी में सबकी रखवाली में खड़ा है। कवि की ऐसी कल्पना से लगता है कि बूढ़ा वृक्ष एक मामूली वृक्ष नहीं है बल्कि वह युगों-युगों से हमारी सुरक्षा का प्रहरी है। हमारी संस्कृति का पोषक है। हर मौसम में एक विश्वसनीय, ईमानदार पहरेदार के रूप में हमारी रक्षा कर रहा है।

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  1. ‘हमारी नींद’ शीर्षक कविता में कवि ने किन अत्याचारियों का जिक्र किया है और क्यों ?

उत्तर:- प्रस्तुत पंक्ति वीरेन डंगवाल द्वारा रचित ‘हमारी नींद’ शीर्षक कविता से संकलित है। इसमें कवि ने सर्वसुविधा सम्पन्न अत्याचारियों की तरफ ध्यान आकर्षित किया है। सामर्थ्यपूर्ण अत्याचारी अपने साम्राज्य का विस्तार करने के लिए तरह-तरह के हथकंडे अपनाते हैं। फिर भी वे गहरी नींद नहीं सो पाते हैं। अभावों के बीच भी भद्र मनुष्य चिन्तारहित एवं आह्लादपूर्ण जीवन जी लेता है। उसकी नींद जीवन के अंतर्मन को सुख देती है।

 

  1. निम्नलिखित पद्यांश से पूछे गये प्रश्नों के उत्तर दें :

“भारतमाता ग्रामवासिनी

खेतों में फैला है श्यामल

धूल-भरा मैला सा आँचल

गंगा-यमुना में आँसू-जल

मिट्टी की प्रतिमा उदासिनी ।”

(i) उपर्युक्त पद्यांश के रचनाकार कौन हैं ?

(ii) प्रस्तुत पंक्तियाँ किस कविता से उद्धृत हैं ?

(iii) भारतमाता कहाँ निवास करती है ? (20 शब्द)

(iv) ‘मिट्टी की प्रतिमा उदासिनी’ किसे कहा गया है और क्यों ?

(v) प्रस्तुत कविता का भावार्थ लिखें

उत्तर:-

(i) सुमित्रानंदन पंत

(ii) भारतमाता

(iii) भारतमाता गाँवों में निवास करती है।

(iv) कवि ने भारत माता की पीड़ा, कुंठा तथा अभाव ग्रस्तता का चित्र प्रस्तुत करते हुए उन्हें

मिट्टी की उदास प्रतिमा कहा है क्योंकि वह अपनी वर्तमान दुर्दशा पर मिट्टी की प्रतिमा के

समान मौन मूक हैं। इस पंक्ति में भारत की दुर्दशा की ओर भी कवि का संकेत है। भारत माता का मानवीकरण किया गया है।

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  1. कवि ने डफाली किसे कहा है और क्यों ?

उत्तर:- कवि ने डफाली दास-वृत्ति की चाह रखनेवालों को कहा है। सभी धर्म के लोगों ने नौकरी की खोज में अपना मान-सम्मान समर्पित कर दिया है। नौकर बनकर स्वामी की ठकुरसुहाती करना ही उनके लिए उत्तम धन है। झूठी प्रशंसा उनके जीवन का अभिन्न अंग बन गयी है।

 

  1. कवि की दृष्टि में आज के देवता कौन हैं और वे कहाँ मिलेंगे ?

उत्तर:- कवि ने जनता को देवता कहा है। मेहनतकश जनता तथा मजदूरों को कवि देवता देखता है और उन्हें सम्मान प्रदर्शित करता है। वह अतिशय प्रसन्न मुद्रा में रहकर कहता रूप है कि आज के देवता जनता है। मेहनतकश मजदूर, शोषित पीड़ितजन ही जो सड़कों पर मिट्टी तोड़ते मिलेंगे, खेतों-खलिहानों में श्रम करते हुए मिलेंगे आज के आधुनिक देवता हैं, वे ही लोक देवता हैं। आज उनकी ही महिमा है। आज उन्हीं की पूजा-अर्चना, वंदना, अभ्यर्थना करना आवश्यक है।

6.”मेरे बिना तुम प्रभु” कविता के आधार पर भक्त और भगवान के बीच के पर प्रकाश डालिए ।

उत्तर:- भक्त और भगवान में अन्योन्याश्रय संबंध है। मनुष्य और ईश्वर के बीच इसी प्रेम से सृष्टि आधारित एवं आरोपित है।

  1. कवि किस तरह के बंगाल में एक दिन लौटकर आने की बात करता है ?

उत्तर:- कवि एक दिन इस बंगाल में लौटकर आने की बात करता है जिसमें अनेक नदियाँ बहती हैं और उनके किनारे धान के लहलहाते खेत रहते हैं।

  1. सप्रसंग व्याख्या कीजिए :-

अति सूधो सनेह को………….. बाँक नहीं।

तहाँ साँचे चलें………….निसक नहीं।

उत्तर- अति सूधो सनेह को मारग है’ सवैया में कवि घनानंद स्नेह के मार्ग की प्रस्तावना करते हुए कहत हैं कि प्रेम का रास्ता अत्यंत सरल और सीधा है। वह रास्ता कहीं भी टेढ़ा-मेढ़ा नहीं है और न उस पर चलने में चतुराई की जरूरत है। इस रास्ते पर वही चलते हैं जिन्हें न अभिमान होता है, न किसी प्रकार की झिझक ऐसे ही लोग निस्संकोच प्रेम-पथ पर चलते हैं। घनानंद कहते हैं कि प्यारे, यहाँ एक ही की जगह है, दूसरे की नहीं पता नहीं, प्रेम करनेवाले कैसा पाठ पढ़ते हैं कि ‘मन’ भर ले लेते हैं लेकिन छटाँक नहीं देते। ‘मन’ में श्लेष अलंकार है जिससे भाव की गहनता और भाषा का सौंदर्य दुगुना हो गया है।

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  1. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दे ?

(ख) ‘हिरोशिमा’ में मनुष्य को साखी के रूप में क्या है ?

(ग) सप्रसंग व्याख्या कीजिए :

सर्दियों की ठंडी………..सुगबुगा उठी

मिट्टी सोने का………..इठलाती है।

(घ) कवि की दृष्टि में समय के रथ का घर नाद क्या है ? स्पष्ट कीजिए।

(ख) ‘हिरोशिया’ में मानव निर्मित अणुबम के चलते भोषण नर-सहार हुआ। बहुत से लोग तो वा बन गए । उनका अता-पता हो नहीं चला। हाँ, जो लोग नहीं रहे, उत्ताप में स्वाहा हो ए उनमें से कुछ को छायाएँ झलसे पत्थरों दीवारों और सड़कों पर उनको साक्षी के रूप में का माहिए कि सहारक प्रवृत्ति को साक्षी के रूप में मौजूद हैं।

(ग) प्रस्तुत पद्मावतरण हमारी पाठ्यपुस्तक में संकलित, रामधारी सिंह दिनकर को जात जन्म’ शीर्षक कविता से उद्धृत है। कविता की इन दो प्रारम्भिक पंक्तियों में कहता

सदियों से स्वतंत्रता प्रकाशित हुई है. फलस्वरूप भारत को भूल-भूसरित जनता के माथे पर नता का स्वर्णिम मुकुट रखा गया है। जनता प्रसन्नता और सुख का अनुभव कर रही है।

(घ) कवि की दृष्टि में समय का घघर- नाद, समय को पुकार समय को जोरदार माँग है और यह माँग है जनता को सत्ता । यह माँग सामान्य रूप से नहीं माँगी जा रही है, यह माँग अत्यन्त बलवती है और जोर-जोर से चिल्ला-चिल्ला कर कही जा रही है। चौक इसमें बैग है, आरोह है,

इसीलिए कवि ने आवाज, पुकार आदि का प्रयोग न कर घर नाद’ का प्रयोग किया है।

* निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर अपने शब्दों में दे ?

  1. समस्त भूमण्डल में सर्वविद् “सम्पदा और प्राकृतिक सौंदर्य से परिपूर्ण देश भारत है।” लेखक ने ऐसा क्यों कहा है ?

उत्तर:- भारत एक प्राचीन देश है। यहाँ आज भी ऐसी वस्तुओं के दर्शन हो सकते हैं, जो सिर्फ पुरातन विश्व में हो सुलभ हो सकते हैं। ऐसे स्थल और जीवन-शैली आप पाएँगे जो अन्यत्र नहीं मिलेंगे। साथ ही, यह अत्यंत बड़ा देश है, जहाँ तेजी से बदलाव आ रहा है। शिक्षा, स्वास्थ्य,

विज्ञान, कृषि, राजनीति प्रति पूल आगे बढ़ने के लिए कसमसा रही है। गाँवों में परिवर्तन दिखाई पड़ रहा है। सीखने या सिखाने योग्य कोई ऐसी बात नहीं जो यहाँ न मिले। अतएव, भारत अतीत और सुदूर भविष्य को जोड़ता है।

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  1. “विष के दाँत’ कहानी का सारांश लिखे।

अथवा, नागरी लिपि कब तक सार्वदेशिक लिपि थी ?

उत्तर:- सेन साहब को अपनी कार पर बड़ा नाज था। घर में कोई ऐसा न था जो गाड़ी तक बिना इजाजत फटकं । पाँचों लड़कियाँ माता-पिता का कहना अक्षरशः पालन करती। किन्तु बुढापे में उत्पन्न खोखा पर घर का कोई नियम लागू न होता था अतः गाड़ी को खतरा था तो इसो

खोखा अर्थात् काशू से। सेन साहब अपने लाइले को इंजीनयर बनाना चाहते थे। वे बहो शान से मित्रों से अपने बेटे की काबलियत की चर्चा करते थे। एक दिन मित्रों को गम्प-गोष्टी और काशू के गुणगान करने के बाद सेन साहब उठे ही थे कि बाहर गुल-गपाड़ा सुना निकले तो देखा कि शोफर गिरधारी की पत्नी से उलझ रहा है और उसका बेटा मदन शोफर पर झपट रहा है। शोफर ने कहा कि मदन गाड़ी छू रहा था और मना करने पर उधम मचा रहा था। सेन साहब ने मदन की माँ को चेतावनी दी और अपने किरानी गिरधर को बुलाकर डाँटा-“अपने बेटे को संभालो।” घर आकर गिरधारी ने मदन को खूब पीटा। दूसरे दिन बगल वाली गली में मदन दोस्तों के साथ लट्टू खेल रहा था। काशू भी खेलने को मचल गया। किन्तु मदन ने लट्टू देने से इनकार कर दिया। काशू की आदत तो बिगड़ी थी। बस आदतवश हाथ चला दिया। मदन भी पिल पड़ा और मार-मार कर कालू के दाँत तोड़ दिए। देर रात मदन घर आया तो सुना कि सेन साहब ने उसके पिता को नौकरी से हय दिया है और आउट हाउस से भी जाने का हुक्म दिया है। मदन के पैर से लोटा लुढ़क गया। आवाज सुनकर उसके माता-पिता निकल आए। मदन मार खाने को तैयार हो गया। गिरधारी उसकी ओर तेजी से बढ़ा किन्तु सहसा उसका चेहरा बदल गया। उसने मदन को गोद में उठा लिया- ‘शाबास बेटा एक मैं हूँ और एक तू है जो खोखा के दो-दो दाँत छोड़ डाले। इस प्रकार हम देखते है कि कहानीकार ने ‘विष के दाँत’ में उच्च वर्ग के सेन साहब की महत्त्वाकांक्षा, सफेदपोशी के भीतर लड़के-लड़कियों में विभेद भावना, नौकरी पेशा वाले गिरधारी को होन-भावना और उसके बीच अन्याय का प्रतिकार करनेवाली बहादुरी और साहस के प्रति प्यार और श्रद्धा को प्रस्तुत करते हुए प्यार-दुलार के कुपरिणामों को बखूबी दर्शाया है।

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अथवा.

हिन्दी तथा इसकी विविध बोलियाँ देवनागरी लिपि में लिखी जाती हैं। नेपाली जेवारी और मराठी की लिपि भी नागरी है। संस्कृत और प्राकृत की पुस्तक भी देवनागरी में ही प्रकाशित होने है। गुजरातो लिपि भी देवनागरी से बहुत भिन्न नहीं बगला लिपि भी प्राचीन नागरी लिपि को

बहन हो हे। सच तो यह है कि दक्षिण भारत की अनेक लिपियाँ नागरी की भाँति हो प्राचीन ब्राह्मी से विकसित है। बारहवीं सदी के श्रीलंका के शासकों के सिक्के पर भी नागरी अक्षर मिलते हैं। महमूद गजनवी मुहम्मद गोरी, अलाउदीन खिलजी शेरशाह ने भी अपने नाम नागरी में खुदवाए हैं और अकबर के सिक्के में भी रामसीय’ शब्द अंकित है। वस्तुतः ईसा की आठवीं-नौवा सह

से नागरी लिपि का प्रचलन सारे देश में था। नागरी नाम को लेकर तरह-तरह के विचार है। किन्तु इतना निश्चित है कि ‘नागरी’ शब्द किसी बड़े नगर से संबंधित है। काशी को देवनगर कहते थे, हो सकता है, वहाँ प्रयुक्त लिपि का नाम ‘देवनागरी’ पड़ा हो । वैसे, गुप्तों की राजधानी पटना भी ‘देवनगर’ थी। इसके नाम पर भोय यह नामकरण हो सकता है। जो भी हो, यह नगर-विशेष की लिपि नहीं थी। आठवीं ग्यारहव सदी में यह सार्वदेशिक लिपि थी।

नागरी लिपि के साथ अनेक प्रादेशिक भाषाएँ जन्म लेती हैं. यथा मराठी, बंगला आदि। नागरी लिपि के लेख न केवल पश्चिम तथा पूर्व बल्कि सूदूर दक्षिण से भी मिले हैं।

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  1. शिक्षा का ध्येय गाँधीजी क्या मानते थे और क्यों ?

उत्तर- गाँधीजी के विचार से अहिंसक प्रतिरोध सबसे उदात्त और बढ़िया शिक्षा है। वर्णमाला सीखने के पहले बच्चे को आत्मा सत्य प्रेम और आत्मा की छिपी शक्तियों का पता होना चाहिए। यह बताया जाना चाहिए कि सत्य से असत्य को और कष्ट सहन से हिंसा को कैसे जोता जा सकता है। बुद्धि की सच्ची शिक्षा शरीर की स्थूल इन्द्रियों अर्थात् हाथ, पैर आदि के ठीक-ठीक प्रयोग से ही हो सकती है। इससे बुद्धि का विकास जल्दी-जल्दी होगा। प्रारम्भिक शिक्षा में सफाई और तन्दुरुस्त रहने के ढंग बताए जाने चाहिए। प्राथमिक शिक्षा में कताई धुनाई को शामिल करना चाहिए ताकि नगर और गाँव एक-दूसरे से जुड़ें। इससे गाँवों का ह्रास रूकेगा। शिक्षा का ध्येय चरित्र निर्माण होना चाहिए। दरअसल, लोगों में साहस, बल, सदाचार और बड़े उद्देश्य के लिए आत्मोत्सर्ग की शक्ति विकसित की जानी चाहिए। संसार की सर्वश्रेष्ठ कृतियों का अनुवाद देश की भाषाओं में होना चाहिए ताकि अपनी भाषा में टॉल्सटाय, शेक्सपियर, मिल्टन, रवीन्द्रनाथ ठाकुर की कृतियों का आनन्द उठा सकें। हमें अपनी संस्कृति के बारे में पहले जानना चाहिए। हमें दूसरी संस्कृतियों के बारे में भी जानना चाहिए, उन्हें तुच्छ समझना गलती होगी। वह संस्कृति जिन्दा नहीं रह सकती जो दूसरों का वहिष्कार करने की कोशिश करती है। भारतीय संस्कृति उन भिन्न-भिन्न संस्कृतियों के सामंजस्य का प्रतीक है जिनके पाँव भारत में जम गए हैं, जिनका भारतीय जीवन पर प्रभाव पड़ा है और वे स्वयं भारतीय जीवन से प्रभावित हुई हैं।

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  1. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर अपने शब्दों में दें।

(क) लखनऊ और रामपुर से विरजू महाराज का क्या सम्बन्ध है ?

(ग) भारतमाता कहाँ निवास करती है ?

(घ) धर्मों की दृष्टि से भारत का क्या महत्व है ?

उत्तर:-

(क) लखनऊ में जफरीन अस्पताल में बिरजू महाराज 1938 की 4 फरवरी को पैदा हुए थे उनका बचपन रामपुर में बीता।

(ग) भारत माता गरीब दुखियों के घर निवास करती हैं। भारत माता का निवास गाँव है जहाँ ये गरीब गुजर-बसर करते हैं ।

(घ) भारत में कई धर्म एवं संप्रदाय मानने वाले लोग निवास करते हैं। भारत धर्म निरपेक्ष राज्य है। धर्म की दृष्टि से भारतीय स्वतंत्र हैं अपना धर्म मानने एवं पूजा करने के लिए।

  1. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर अपने शब्दों में दें। प्रत्येक प्रश्न के लिए अंक उनके सम्मुख निर्धारित हैं !

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(ख) गम्मा का अपनी बह के साथ किस बात को लेकर विवाद था ?

(ख) मंगम्मा का अपनी बहू नजम्मा के साथ पोते को लेकर विवाद था। एक दिन बेटे की किसी गलती पर उसकी माँ नजम्मा उसे पीट रही थी। पहले तो कुछ देर मंगम्मा चुप रही किन्तु जब रहा न गया तो मंगुम्मा ने बहू से कहा ” क्यों रे राक्षसी, इस छोटे से बच्चे को क्यों पीट रही ” बस, बहू चढ़ बैठी। खूब सुनाई उसने । जब मंगम्मा ने कहा कि मैं तुम्हारे घरवाले की माँ हूँ तो बह ने कहा- ‘मैं भी इसकी माँ हूँ। मुझे क्या अकल सिखाने चली है ?’ बात बढ़ गई। जब मंगम्मा ने बेटे से शिकायत की तो उसने कहा कि वह अपने बेटे को मारती है तो तुम क्यों उस झगड़े में पड़ती हो ? मंगम्मा ने कहा- ‘बीवी ने तुझ पर जादू फेरा है? वह जो कहें ठीक । वह कहे तो मुझे निकाल देगा ?” बेटा बोला-‘ और क्या किया जा सकता है ?’ मंगम्मा चकित । बस उसी दोपहर बहू ने मंगम्मा के बर्तन-भांडे अलग कर दिए ।

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  1. निम्नलिखित पंक्तियों का भाव स्पष्ट करें:

“हुकारों से महलों की नींव उखड़ जाती

सासों के बल से ताज हवा में उड़ता है,

जनता की रोके राह. समय में ताव कहाँ ?

वह जिधर चहती, काल उधर ही मुड़ता है।

उत्तर:- प्रस्तुत काव्य पंक्तियाँ हमारी पाठ्यपुस्तक के ‘जनतंत्र का जन्म’ काव्य पाठ से लो गयी हैं। इन पंक्तियों में कवि के कहने का आशय है कि जनता को हुँकार से जनता की ललकार से, राजमहलों की नीवें उखड़ जाती हैं। मूल भाव है कि जनता और जनतंत्र के आगे राजतंत्र का अब कोई मोल नहीं। जनता की साँसों के बल से राजमुकुट हवा में उड़ जाते हैं गूढार्थ हुआ कि जनता ही राजा को मान्यता प्रदान करती है और वही राजा का बहिष्कार या समाप्त भी करती है। जन-पथ को कौन अवतक रोक सका है ? समय में वह ताव या शक्ति कहाँ जो जनता की राह को रोक सके। महाकारवाँ के भय से समय भी दुबक जाता है। जनता जैसा चाहती है. समय भी वैसी ही करवट बदल लेता है जनता के मनोनुकूल समय बन जाता है। यहाँ मूल भाव यह है कि किसी भी तंत्र की नियामक शक्ति जनता है। उसका महत्त्व सर्वोपरि है।

  1. (अ) पाप्पति कौन थी ? उसे शहर क्यों लाया गया था ?

(ब) माँ मंगु को अस्पताल में क्यों नहीं भर्ती कराना चाहती थी ?

उत्तर:-

(अ) पाप्पाति तमिलनाडु के एक गाँव की महिला वल्लि अम्माल की बेटी थी। उसे बुखार आ गया। जब वल्लि अम्माल उसे लेकर गाँव के प्राइमरी हेल्थ सेंटर में दिखाने गई तो के डॉक्टर ने अगले दिन सुबह ही जाकर नगर के बड़े अस्पताल में दिखाने को कहा। बस पाप्पाति को लेकर सुबह की बस से नगर के बड़े अस्पताल में दिखाने पहुँच गई।

(ब) माँ अस्पताल की व्यवस्था से मन ही मन काँप जाती थी। वह लोगों को अस्पताल के लिए गोशालाओं की उपमा देती थीं। मंगु बिस्तर पर पाखाना पेशाब कर देती थी। वह खिलाने पर ही खाती थी। माँजी की मान्यता थी कि अस्पताल में डॉक्टर नर्स आदि सभी अपना कोरम पूरा करेंगे। भींगने पर कौन उसके कपड़े और बिस्तर बदलेगा माँजी के मन में इसी तरह के विविध प्रश्न उठा करते थे। इन्हीं कारणों से वह मंगु को अस्पताल में भर्ती नहीं कराना चाहती थी ।

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  1. लेखक द्वारा नाखूनों को अस्त्र के रूप में देखना कहाँ तक संगत है ?

उत्तर- लेखक मनुष्य के नाखूनों को अस्त्र के रूप में देखकर निराश हो जाता है। लेख नाखूनों को प्रतीकात्मक प्रयोगों द्वारा यह सिद्ध करना चाहता है कि ये उसकी (मानव को) पाशविक वृत्ति के जीवंत प्रतीक है। मनुष्य की पशुता को जितनी बार भी काट दो, वह मरना नहीं चाहती। लेखक का विचार यह है कि बदलते परिवेश में मानव अब नाखून नहीं चाहता किन्तु प्रकृति उसे जिलाए जा रही है और मनुष्य उसे काटता जा रहा है। कहने का भाव यह है कि मनुष्य को कोटि-कोटि गुना शक्तिशाली अस्त्र मिल चुका है लेकिन मनुष्य न चाहकर भी बर्वरता और नृशंसता की ओर ही बढ़ रहा है- कारण है कि उसके भीतर बर्बर युग का कोई अवशेष शेष रह गया है। यह उसे असहय है। मनुष्य के इतिहास में हिरोशिमा का नृशंस नरसंहार इसका ज्वलत प्रमाण है। यह उसका नवीनतम रूप है। इसी कारण नाखूनों के प्रतीकात्मक प्रयोगों द्वारा लेखक यह सिद्ध करना चाहता है कि मनुष्य जितना विकास कर ले लेकिन उसके भीतर की पशुता जबतक नहीं मरेगी तबतक वह विध्वंसक और विनाशक कदम उठाता रहेगा जो सृष्टि के लिए हानिकारक है। 

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